Saturday, November 7, 2009

चहारदीवारी का आधा सच

रेटिंग-**
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निर्देशक: मधुर भंडारकर
कलाकार: नील नितिन मुकेश, मनोज बाजपेयी मुग्धा गोडसे और आर्य बब्बर
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अगर आप मधुर भंडारकर के बहुत बड़े फैन हैं, तो फिल्म देखने जा सकते हैं। या फिर में होने वाली गतिविधियों में दिलचस्पी रखते हैं, तो भी फिल्म देखी जा सकती है। लेकिन आप नएपन की उम्मीद में जाते हैं, तो निराशा ही हाथ लगेगी। क्योंकि पिछली कई फिल्मों में जेल की जिस जिंदगी को टुकड़ों- टुकड़ों में दिखाया गया है, मधुर भंडारकर ने उसी जिंदगी पूरी फिल्म में ढाल दिया है। आशा थी कि मधुर 'जेल' की चहारदीवारी के अंदर की कुछ ऐसी घटनाओं को दिखाएंगे, जो अब तक किसी ने पेश नहीं की हैं।
मधुर की पिछली फिल्मों 'चांदनी बार', 'कॉर्पोरेट', 'ट्रैफिक सिग्नल' और 'फैशन' की बात करें, तो इन फिल्मों में कहानी थी। सिस्टम और उसकी नाकामियां थीं। आम आदमी और उसकी समस्याएं थीं, लेकिन 'जेल' में ऐसा कुछ नहीं है कि एकदम से मुंह से निकले 'वाह, क्या फिल्म है।' या 'अच्छा, ऐसा भी होता है क्या।'
पराग दीक्षित (नील नितिन मुकेश) एक सॉफ्टवेयर कंपनी में मैनेजर है। वह एअरहॉस्टेस मानसी (मुग्धा गोडसे) से प्यार करता है। पराग, मानसी अपने एक दोस्त के साथ एक ही फ्लैट में रहते हैं। एक दिन दोस्त के कर्मों की वजह से पराग को जेल जाना पड़ जाता है।
जेल में किस तरह के लोग मिलते हैं, यही दिखाने की कोशिश की गई है। लेकिन यह नहीं समझ आता कि मनोज बाजपेयी सिर्फ नील की ही मदद क्यों करते हैं, जबकि जेल जाने का दर्द हर उस इंसान के चेहरे पर पढ़ा जा सकता है, जो जिसने गुनाह किया है या जो बेगुनाह है। राजपाल यादव अभिनीत 'अंडर ट्रायल' में जो इमोशन उभर कर आते हैं, 'जेल' में उन्हीं इमोशंस का अभाव है। किसी किरदार या परिस्थिति से जुड़ाव महसूस नहीं होता। फिल्म के कुछ डायलॉग बहुत अच्छे लिखे गए हैं।
नील ने अपनी तरफ से जोरदार कोशिश की है कि किरदार को दमदार बनाया जा सके। एक आम लड़का जिसने अदालत का दरवाजा भी न देखा हो और जेल जाना पड़ जाए, उसकी क्या हालत होगी, यह नील ने अपनी ऐक्टिंग से दिखाया है। मुग्धा को जितना स्पेस दिया गया है, वे उसमें भी खास नहीं कर पाईं। मनोज बाजपेयी अपनी जगह ठीक हैं, जबकि आर्य बब्बर ने अपने रोल को भरपूर जिया है। राहुल सिंह भी फिट रहे हैं।
लाता मंगेशकर की आवाज में 'मौला दे, दाता दे' प्रार्थना बहुत अच्छी है। इमोशनल सीन्स को मजबूती देने के लिए इसे बैकग्राउंड के तौर पर कई जगह इस्तेमाल किया जा सकता था।

1 comment:

  1. shayad tum thik hi keh rahe ho... ek cheez achhi dene ke baad phir filmmaker neeche ki taraf hi jyadatar jaane lagta hai...

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