Saturday, November 7, 2009

रणबीर के लिए सांवरिया है खास

रणबीर कपूर की पहली फिल्म 'सांवरिया' बॉक्स ऑफिस पर भले ही बुरी तरह पिट गयी हो, लेकिन उनके दिल में यह अब भी बसी है। रणबीर का कहना है कि 'सांवरिया' के लिए उनके दिल में अभी भी एक खास जगह है। वे कहते हैं, 'फिल्म बॉक्स ऑफिस पर पिट जरूर गयी हो, लेकिन इसने मुझे कुछ भी नया करने से नहीं रोका है। मैंने खुद को हारा हुआ जरूर महसूस किया था, लेकिन इसने मेरे दिल में एक खास जगह बनायी है। यह मेरे लिए एक खास फिल्म थी, क्योंकि इसमें मैंने बतौर ऐक्टर पहली बार काम किया था। मुझे अपने अभिनय पर पॉजिटिव रिएक्शन मिला। इसके अलावा यश चोपड़ा और धर्मा प्रोडक्शन से मुझे काफी अच्छे ऑफर भी मिले। सिर्फ मेरे परिवार ने ही नहीं, बल्कि फिल्म इंडस्ट्री ने भी मुझे समर्थन दिया। फिल्म का प्रदर्शन बहुत बेहतर नहीं रहने के बावजूद उन्होंने कहा कि उन्हें मेरा अभिनय पसंद आया।' खैर, 'सांवरिया' रणबीर की डेब्यु फिल्म थी और अपनी पहली फिल्म के लिए हर ऐक्टर के दिल में खास जगह तो होती ही है।

चहारदीवारी का आधा सच

रेटिंग-**
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निर्देशक: मधुर भंडारकर
कलाकार: नील नितिन मुकेश, मनोज बाजपेयी मुग्धा गोडसे और आर्य बब्बर
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अगर आप मधुर भंडारकर के बहुत बड़े फैन हैं, तो फिल्म देखने जा सकते हैं। या फिर में होने वाली गतिविधियों में दिलचस्पी रखते हैं, तो भी फिल्म देखी जा सकती है। लेकिन आप नएपन की उम्मीद में जाते हैं, तो निराशा ही हाथ लगेगी। क्योंकि पिछली कई फिल्मों में जेल की जिस जिंदगी को टुकड़ों- टुकड़ों में दिखाया गया है, मधुर भंडारकर ने उसी जिंदगी पूरी फिल्म में ढाल दिया है। आशा थी कि मधुर 'जेल' की चहारदीवारी के अंदर की कुछ ऐसी घटनाओं को दिखाएंगे, जो अब तक किसी ने पेश नहीं की हैं।
मधुर की पिछली फिल्मों 'चांदनी बार', 'कॉर्पोरेट', 'ट्रैफिक सिग्नल' और 'फैशन' की बात करें, तो इन फिल्मों में कहानी थी। सिस्टम और उसकी नाकामियां थीं। आम आदमी और उसकी समस्याएं थीं, लेकिन 'जेल' में ऐसा कुछ नहीं है कि एकदम से मुंह से निकले 'वाह, क्या फिल्म है।' या 'अच्छा, ऐसा भी होता है क्या।'
पराग दीक्षित (नील नितिन मुकेश) एक सॉफ्टवेयर कंपनी में मैनेजर है। वह एअरहॉस्टेस मानसी (मुग्धा गोडसे) से प्यार करता है। पराग, मानसी अपने एक दोस्त के साथ एक ही फ्लैट में रहते हैं। एक दिन दोस्त के कर्मों की वजह से पराग को जेल जाना पड़ जाता है।
जेल में किस तरह के लोग मिलते हैं, यही दिखाने की कोशिश की गई है। लेकिन यह नहीं समझ आता कि मनोज बाजपेयी सिर्फ नील की ही मदद क्यों करते हैं, जबकि जेल जाने का दर्द हर उस इंसान के चेहरे पर पढ़ा जा सकता है, जो जिसने गुनाह किया है या जो बेगुनाह है। राजपाल यादव अभिनीत 'अंडर ट्रायल' में जो इमोशन उभर कर आते हैं, 'जेल' में उन्हीं इमोशंस का अभाव है। किसी किरदार या परिस्थिति से जुड़ाव महसूस नहीं होता। फिल्म के कुछ डायलॉग बहुत अच्छे लिखे गए हैं।
नील ने अपनी तरफ से जोरदार कोशिश की है कि किरदार को दमदार बनाया जा सके। एक आम लड़का जिसने अदालत का दरवाजा भी न देखा हो और जेल जाना पड़ जाए, उसकी क्या हालत होगी, यह नील ने अपनी ऐक्टिंग से दिखाया है। मुग्धा को जितना स्पेस दिया गया है, वे उसमें भी खास नहीं कर पाईं। मनोज बाजपेयी अपनी जगह ठीक हैं, जबकि आर्य बब्बर ने अपने रोल को भरपूर जिया है। राहुल सिंह भी फिट रहे हैं।
लाता मंगेशकर की आवाज में 'मौला दे, दाता दे' प्रार्थना बहुत अच्छी है। इमोशनल सीन्स को मजबूती देने के लिए इसे बैकग्राउंड के तौर पर कई जगह इस्तेमाल किया जा सकता था।

संतोषी की संतोषजनक फिल्म

रेटिंग-***
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निर्देशक: राजकुमार संतोषी
कलाकार: रणबीर कपूर, कैटरीना कैफ, दर्शन जरीवाला और उपेन पटेल
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वही एक सिली सा लड़का, जो लड़की से प्यार का इजहार नहीं कर पाता। वही एक लड़की, जो किसी और से प्यार करती है, लेकिन सिली सा लड़का उसका अच्छा दोस्त है। लव ट्राएंगल की वही पुरानी कहानी, लेकिन राजकुमार संतोषी के नए ट्रीटमेंट के साथ प्रस्तुत है। संतोषी की 'अंदाज अपना अपना' के बाद यह दूसरी कॉमेडी फिल्म है, जो यूथ्स को पसंद आएगी। अगर आपने पिछली कॉमेडी फिल्में एंजॉय की हैं, इस शर्त पर कि हमें सिर्फ हंसना है, तो 'अजब प्रेम की गजब कहानी' को भी एंजॉय करेंगे।
प्रेम (रणबीर कपूर) बेकार लड़का है, जो एक क्लब चलाता है। क्लब का उसूल है, दुख से दूर रहना और लोगों की मदद करना। प्रेम के पिता शंकर (दर्शन जरीवाला) उससे खुश नहीं हैं। एक शहर में नई लड़की जैनी (कैटरीना कैफ) आती है, जिससे प्रेम को प्यार हो जाता है। जैनी क्रिश्चियन है और प्रेम उसके लिए खुद को बदल लेता है, लेकिन बाद में उसे पता चलता है कि जैनी राहुल (उपेन पटेल) से प्यार करती है।
राजकुमार संतोषी ने कॉमेडी ही नहीं, इमोशंस को भी बहुत खूबसूरती से उभारा है। प्रेम का जैनी को प्रपोज करना और जैनी की स्वीकृति के साथ ही बैकग्राउंड में गीत 'तेरा होने लगा हूं...' का म्यूजिक शुरू होना, सीन को बहुत मजबूत बनाता है। इसके अलावा सलमान खान का गेस्ट अपीरिंयस बहुत मजेदार है। प्रेम का अपने पिता के साथ दोस्ताना रिश्ता और नोंकझोंक काफी दिलचस्प है। फिल्म में कई सीन ऐसे हैं, जो सीट से उछलकर हंसने को मजबूर कर देते हैं। हालांकि सेट बहुत बनावटी लगता है, लेकिन गीतों में जो लोकेशन इस्तेमाल की है, उसके लिए थिरू की सिनेमैटोग्राफी तारीफ के काबिल है।
रणबीर कपूर ने सीरियस रोल से करियर की शुरुआत की और इस बीच कई फिल्में कीं। अब उन्होंने कॉमेडी में भी अपनी जगह सिक्योर कर ली है। कैटरीना कैफ ने भी अच्छा काम किया है। लेकिन उपेन पटेल ऐक्टिंग के मामले में पीछे रह गए। दर्शन जरीवाला, गोविंद नामदेव, स्मिता जयकर आदि कलाकारों को अभिनय का भरपूर मौका दिया गया।
प्रीतम का म्यूजिक अच्छा है, लेकिन उनकी धुनों को उसी खूबसूरत अंदाज में आतिफ असलम ने गाया भी है। फिल्म का भोजपुरी स्टाइल में लिखा गया गीत भी शानदार है।